
यह पैतृक संपत्ति का मुद्दा तो हर भारतीय घर में रोज़ाना की बहस का विषय बन जाता है ना? खासकर जब फैमिली में भाई-बहन मिलते हैं या कोई जमीन-जायदाद बेचने-खरीदने की बात आती है। सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फैसलों ने तो जैसे सारी पुरानी भ्रांतियों को साफ कर दिया है। अगर आपके पास भी कोई पुरानी पैतृक प्रॉपर्टी है या आप ऐसी डील करने की सोच रहे हैं, तो ये नए नियम जान लेना ज़रूरी है। वरना कल को कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। चलिए, सरल शब्दों में समझते हैं कि अब पैतृक संपत्ति को संभालने के क्या नए कानून हैं।
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पैतृक संपत्ति बेचना अब इतना आसान नहीं
दोस्तों, पहले तो एक भाई अकेले ही सब कुछ बेच देता था, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कह दिया है कि पैतृक संपत्ति बेचना या ट्रांसफर करना सबकी आपसी सहमति पर टिका है। अगर प्रॉपर्टी अभी बंटी नहीं है, तो कोई एक व्यक्ति अकेला फैसला नहीं ले सकता। सब सह-वारिसों को हामी भरनी पड़ेगी। ये नियम इसलिए हैं ताकि परिवार में झगड़े न हों और सबका हक बचे। सोचिए, अगर आपका भाई बिना बताए बेच दे तो क्या होगा? इसलिए हर कदम सोच-समझकर उठाएं।
अविभाजित जमीन पर सबकी बराबर राय ज़रूरी
मान लीजिए आपकी फैमिली की पैतृक जमीन अभी तक बांटी नहीं गई। यहां हर सह-वारिस का बराबर अधिकार है – चाहे बेटा हो या बेटी। कोई एक अपना हिस्सा निकालकर बेचना चाहे, तो पहले कोर्ट या फैमिली मीटिंग से औपचारिक पार्टिशन करवाना पड़ेगा। बिना सहमति के बिक्री अवैध मानी जाएगी। मैंने खुद देखा है, कई परिवार ऐसे फंस जाते हैं कि सालों कोर्ट में पिसते रहते हैं। बेहतर है, शुरू से ही सबको शामिल करें।
पार्टिशन हो गया तो फुल कंट्रोल आपके पास
अब अच्छी बात ये है कि अगर प्रॉपर्टी पहले ही बंट चुकी है – चाहे कोर्ट के आदेश से या सबकी सहमति से – तो जो हिस्सा आपको मिला, वो आपकी निजी संपत्ति हो जाती है। इसे बेचें, गिफ्ट करें या वसीयत में लिखें, किसी की परमिशन की ज़रूरत नहीं। हाल के एक केस में सुप्रीम कोर्ट ने यही दोहराया कि पार्टिशन के बाद ये सेल्फ-एक्वायर्ड प्रॉपर्टी है। इससे परिवारों को राहत मिली है, क्योंकि अब अपने हिस्से पर मनमर्ज़ी से फैसला ले सकते हैं।
बेटियों को भी बराबर का हक
याद है वो पुराने ज़माने जब बेटियों को पैतृक संपत्ति से हाथ धोना पड़ता था? 2005 के हिंदू सक्सेशन अमेंडमेंट एक्ट और 2020 के विपक्षी फैसले ने सब बदल दिया। अब बेटियां जन्म से ही को-पार्सिनर हैं, बेटों जितना ही हक। ये बदलाव ने लाखों महिलाओं को ताकत दी है। अगर आपकी बहन का हक छिनने की कोशिश हो रही है, तो सीधे कोर्ट जाएं। परिवार में समानता लाने के लिए ये सबसे बड़ा कदम है।
दावा करने की समय सीमा न भूलें
कानून सख्त है – लिमिटेशन एक्ट के तहत पैतृक संपत्ति पर 12 साल तक दावा न करें या कब्जा न रखें, तो आपका अधिकार कमज़ोर पड़ जाता है। कई लोग सोचते हैं कि ‘हमारा तो हक है’, लेकिन देर हो जाती है। इसलिए, अगर आपको लगता है कि आपका हिस्सा फंस गया है, तो तुरंत एक्शन लें। वकील से बात करें, दस्तावेज़ जुटाएं। ये छोटी सी नसीहत भविष्य के झगड़ों से बचा सकती है।
माता-पिता की सुरक्षा के लिए बेदखली का हक
सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर सिटिज़न्स एक्ट के तहत माता-पिता को ताकत दी है। अगर बच्चे उनकी देखभाल नहीं करते, तो वे संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। ये फैसला भावुक लग सकता है, लेकिन बुजुर्गों की रक्षा के लिए ज़रूरी है। परिवार में प्यार हो तो ऐसा कभी न हो, लेकिन कानून सबके हित में है।
आदिवासी बहनों के लिए नया न्याय
जुलाई 2025 के एक फैसले ने अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बराबर हक दिया। पहले परंपराएं बाधा बनती थीं, लेकिन अब कोर्ट ने कहा – समानता सबके लिए। ये सामाजिक बदलाव की दिशा में मील का पत्थर है।
सिर्फ एग्रीमेंट से मालिकाना हक नहीं
17 अक्टूबर 2025 के फैसले में कोर्ट ने चेतावनी दी – बिक्री समझौता करने से ओनरशिप ट्रांसफर नहीं होता। रजिस्ट्री और सेल डीड बिना, असली मालिक वही रहता है। कई स्कैम इसी चक्कर में होते हैं, सावधान रहें।
सलाह: परिवार और वकील से पहले बात करें
अंत में, पैतृक संपत्ति के किसी फैसले से पहले फैमिली मीटिंग करें, पेपर्स चेक करें और लीगल एक्सपर्ट से सलाह लें। म्यूचुअल ट्रस्ट से लिया गया निर्णय परिवार को एकजुट रखेगा। ये नियम जटिल लगते हैं, लेकिन समझ लें तो जीवन आसान हो जाता है। सही जानकारी ही सबसे बड़ा हथियार है।
















