
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने महिलाओं के अधिकारों की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाते हुए दशकों पुरानी कानूनी बाधाओं को ध्वस्त कर दिया है, अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पति से विरासत में मिली गैर-पैतृक (non-ancestral) संपत्ति पर विधवा महिला का पूर्ण अधिकार है और वह इसे बेचने के लिए किसी की अनुमति लेने को बाध्य नहीं है।
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44 साल पुराने विवाद का अंत
जस्टिस विरिंदर अग्रवाल ने 22 जनवरी 2026 को सुनाए गए इस फैसले में एक 44 साल पुराने मामले (मोहम्मद अशरफ बनाम सादिक) का निपटारा किया, यह मामला 1982 में गुरुग्राम जिले में हुई एक जमीन की बिक्री से जुड़ा था, निचली अदालतों ने पुराने रिवाजों के आधार पर इस बिक्री को अवैध घोषित कर दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने पलट दिया है।
कोर्ट के फैसले की बड़ी बातें
- कोर्ट ने दो-टूक कहा कि लिंग या वैवाहिक स्थिति के आधार पर संपत्ति बेचने पर रोक लगाने वाली कोई भी पुरानी परंपरा (जैसे मेओ समुदाय का ‘रिवाज-ए-आम’) असंवैधानिक है।
- जस्टिस अग्रवाल ने रेखांकित किया कि महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को सीमित करना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का खुला उल्लंघन है। परंपराएं समानता के संवैधानिक सिद्धांतों के आड़े नहीं आ सकतीं।
- यदि संपत्ति गैर-पुश्तैनी है, तो विधवा उसे अपनी जरुरतों के लिए स्वतंत्र रूप से बेच सकती है, उसे पति के अन्य रिश्तेदारों (Collaterals) की सहमति लेने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है।
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संपत्ति बेचने पर क्यों था विवाद?
अब तक कई ग्रामीण इलाकों में यह माना जाता था कि विधवा को संपत्ति में केवल ‘जीवन भर का हित’ (Life Estate) मिलता है, यानी वह उसे केवल उपभोग कर सकती है, बेच नहीं सकती, इस फैसले ने इस ‘सामंती अवशेष’ को खत्म कर विधवाओं को आर्थिक रुप से सशक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है।
सुप्रीम कोर्ट का पूरक फैसला
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि एक विधवा बहू का अपने ससुर की पुश्तैनी संपत्ति पर भरण-पोषण के लिए पूरा अधिकार है, भले ही वह ससुराल में न रहती हो
















