
30 जनवरी 2026 को राज्यसभा में दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पेंशनर्स के लिए एक बड़ी खबर सामने आई है,लंबे समय से ₹1,000 की न्यूनतम पेंशन को बढ़ाकर ₹7,500 करने की मांग कर रहे लाखों ईपीएस-95 (EPS-95) लाभार्थियों को फिलहाल सरकार से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है।
यह भी देखें: Gold-Silver Crash: सोने-चांदी की कीमतों में गिरावट! चांदी ₹67,891 और सोना ₹15,246 लुढ़का; जानें खरीदने का सही समय।
Table of Contents
EPFO पेंशन वृद्धि: संसद में सरकार का आधिकारिक स्टैंड
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने राज्यसभा में स्पष्ट किया कि ईपीएस-95 के तहत न्यूनतम मासिक पेंशन को ₹1,000 से बढ़ाकर ₹7,500 करने का फिलहाल कोई नया प्रस्ताव या समयसीमा तय नहीं है।
मुख्य अपडेट्स
- राज्यसभा सांसद डॉ. मेधा विश्राम कुलकर्णी के सवाल के लिखित जवाब में सरकार ने बताया कि वर्तमान में पेंशन बढ़ाने का कोई अलग प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।
- सरकार ने जोर देकर कहा कि EPS-95 एक ‘निर्धारित योगदान-निर्धारित लाभ’ (Defined Contribution–Defined Benefit) योजना है मंत्रालय के अनुसार, पेंशन में किसी भी वृद्धि के लिए पेंशन फंड की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता और भविष्य की देनदारियों का आकलन करना अनिवार्य है।
- वर्तमान में, सरकार वार्षिक बजटीय सहायता के माध्यम से ₹1,000 की न्यूनतम पेंशन सुनिश्चित कर रही है, फंड का मूल्यांकन (Valuation) हर साल किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि फंड भविष्य के भुगतान के लिए सक्षम है।
यह भी देखें: Mobile Charging Tips: फोन को 100% चार्ज करना पड़ सकता है भारी, जानें सही चार्जिंग तरीका
वेतन सीमा (Wage Ceiling) में बदलाव की सुगबुगाहट
भले ही न्यूनतम पेंशन पर फैसला टल गया हो, लेकिन सरकार वेतन सीमा (Wage Ceiling) को लेकर गंभीर दिख रही है:
- सरकार वर्तमान ₹15,000 की वेतन सीमा को बढ़ाकर ₹25,000 करने पर विचार कर रही है।
- यह कदम हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के बाद उठाया जा रहा है, जिसमें सरकार से पुरानी वेतन सीमा की समीक्षा करने को कहा गया था।
- यदि वेतन सीमा बढ़ती है, तो ईपीएफओ के दायरे में अधिक कर्मचारी आएंगे और भविष्य में मिलने वाली पेंशन राशि में भी आनुपातिक सुधार हो सकता है।
पेंशनर्स एसोसिएशन और नेशनल एजिटेशन कमेटी (NAC) लगातार ₹7,500 पेंशन और महंगाई भत्ते (DA) की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन सरकार ने फिलहाल “फंड की कमी” और “वित्तीय बोझ” का हवाला देते हुए इसे ठंडे बस्ते में रखा है।
















