
क्या आपका घर किराए पर है? क्या इसका मतलब है कि आप अब ‘उपभोक्ता’ (Consumer) नहीं रहे? इस सवाल का जवाब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने हाल ही में दिया है और लाखों घर खरीदारों के लिए यह राहत की खबर है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सिर्फ फ्लैट (Flat) को किराए पर देना उसे ‘कमर्शियल उद्देश्य’ (Commercial Purpose) से खरीदी गई संपत्ति नहीं बनाता।
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मामला क्या था?
मामला गुरुग्राम (Gurugram) के दो फ्लैट खरीदारों से जुड़ा है। वर्ष 2005 में उन्होंने एक डेवलपर से फ्लैट खरीदा। खरीद के समय समझौते के अनुसार 36 महीनों में फ्लैट का कब्जा (Possession) मिलना तय था, लेकिन वास्तविकता में उन्हें फ्लैट लगभग 6 साल बाद, यानी 2015 में मिला। कब्जा मिलने के बाद, खरीदारों ने फ्लैट को किराए पर दे दिया। इसके बाद उन्होंने देरी से कब्जा मिलने और गलत व्यापार व्यवहार (Defective Business Practices) का आरोप लगाते हुए NCDRC (National Consumer Disputes Redressal Commission) में शिकायत दर्ज कराई।
NCDRC ने क्यों खारिज की शिकायत?
डेवलपर ने दावा किया कि खरीदारों ने फ्लैट को ‘कमर्शियल उद्देश्य’ (Commercial Purpose) से खरीदा था, क्योंकि कब्जा मिलने के तुरंत बाद उन्होंने फ्लैट को किराए पर दे दिया। NCDRC ने डेवलपर की बात मानते हुए शिकायत खारिज कर दी। निर्णय के अनुसार, किराए पर देने वाले खरीदार अब उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आते।
सुप्रीम कोर्ट में खरीदारों ने क्या कहा?
खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि फ्लैट व्यक्तिगत उपयोग (Personal Use) के लिए खरीदा गया था। यह उनके माता-पिता के रहने की जरूरत को पूरा करने के लिए था। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फ्लैट को किराए पर देना एक व्यावहारिक कदम (Practical Step) था, क्योंकि उन्हें तुरंत इसका इस्तेमाल खुद करने की जरूरत नहीं थी। कोर्ट को बताया कि किराए पर देना खरीद को कमर्शियल नहीं बनाता।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने NCDRC का फैसला रद्द कर दिया और कहा कि:
- केवल फ्लैट को किराए पर देने से कोई खरीदार कमर्शियल उद्देश्य वाले खरीदार नहीं बन जाता।
- मुख्य सवाल यह है कि खरीद का उद्देश्य क्या था: व्यक्तिगत उपयोग (Personal Use) या मुनाफा कमाना (Profit Making)।
- इसे साबित करने का जिम्मा डेवलपर/बिल्डर पर है, खरीदार पर नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कमर्शियल उद्देश्य का मतलब है – लाभ कमाने के इरादे से की गई खरीद। सिर्फ किराया लेना इसे साबित नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश
- अगर किसी व्यक्ति के पास दो-तीन प्रॉपर्टी हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने आप व्यापारी (Businessman) बन जाता है।
- मुनाफे का इरादा होना जरूरी है।
- फ्लैट किराए पर देना सामान्य और वैध व्यवहार है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय में घर खरीदारों को उपभोक्ता (Consumer) माना। NCDRC का फैसला रद्द कर दिया गया और मामला फिर से सुनवाई के लिए NCDRC को भेजा गया। अब शिकायत की सुनवाई देरी, मुआवजा और गलत व्यापार व्यवहार जैसी मूल बातें पर होगी।
इस फैसले का महत्व
यह फैसला लाखों घर खरीदारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अक्सर डेवलपर या बिल्डर यह दावा करते हैं कि किराए पर देना फ्लैट को कमर्शियल बनाता है, ताकि उपभोक्ता अधिकारों (Consumer Rights) का दायरा कम हो जाए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब यह स्पष्ट हो गया है कि:
- घर खरीदना और किराए पर देना सामान्य और वैध व्यवहार है।
- उपभोक्ता कानून (Consumer Protection Law) के तहत ऐसे खरीदार उपभोक्ता ही माने जाएंगे।
- साबित करने की जिम्मेदारी डेवलपर पर है, न कि खरीदार पर।
इस फैसले से रियल एस्टेट (Real Estate) और हाउसिंग सेक्टर में खरीदारों को बड़ी राहत मिली है।
SC फैसला आसान शब्दों में
- फ्लैट खरीद का मुख्य उद्देश्य महत्वपूर्ण है।
- किराए पर देना खरीद को बिज़नेस नहीं बनाता।
- उपभोक्ता अधिकारों के तहत सुरक्षा बनी रहती है।
- डेवलपर को साबित करना होगा कि खरीदार का मकसद मुनाफा कमाना था।
















