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नगर निगम या नगर पालिका? आपके शहर की सुविधाओं का असली बॉस कौन है? जान लीजिए वो 5 फर्क जो हर नागरिक को पता होने चाहिए।

शहर की साफ-सफाई, सड़कें, पानी-बिजली नगर निगम या पालिका कौन तय करता है? टैक्स के पैसे कहाँ जाते हैं? 5 बड़े फर्क जानें जो आपकी जिंदगी बदल देंगे। हर नागरिक अलर्ट हो जाए!

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महाराष्ट्र के हालिया निकाय चुनावों ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। मुंबई जैसे बड़े शहर में एक प्रमुख दल ने जबरदस्त प्रदर्शन किया है, खासकर एशिया के सबसे विशाल नगर निगम में मेयर पद पर काबिज होने की स्थिति बनाई है। ऐसे में आम लोग सोच रहे हैं कि आखिर ये नगर निकाय क्या बला हैं और इनमें निगम व पालिका का फर्क क्या है।

नगर निगम या नगर पालिका? आपके शहर की सुविधाओं का असली बॉस कौन है? जान लीजिए वो 5 फर्क जो हर नागरिक को पता होने चाहिए।

स्थानीय शासन की बुनियाद

शहरों व कस्बों में रोजमर्रा की जरूरतें जैसे पानी पहुंचाना, गलियां साफ रखना या पार्कों को हरा-भरा बनाए रखना, इन स्थानीय निकायों का ही काम है। ये छोटे स्तर की सरकारें होती हैं जो राज्य स्तर से अलग होकर काम करती हैं। जगह के आकार व आबादी के आधार पर इनका स्वरूप तय होता है – छोटे इलाके में साधारण व्यवस्था, बड़े में जटिल तंत्र। इससे स्थानीय मुद्दों का तुरंत समाधान संभव होता है।

नगर निगम, महानगरों का बॉस

बड़े शहर जहां लाखों लोग रहते हैं, वहां नगर निगम का राज चलता है। ये उन इलाकों के लिए हैं जहां आबादी पांच लाख से ऊपर पहुंच चुकी हो। मुंबई, दिल्ली, पुणे या बेंगलुरु जैसे हब इसी श्रेणी में आते हैं। इन्हें कई वार्डों में बांटा जाता है, हर वार्ड से लोग अपना पार्षद चुनते हैं। ये पार्षद मिलकर बड़े फैसले लेते हैं – बजट बनाना, विकास योजनाएं चलाना। सबसे ऊपर महापौर होते हैं, जिन्हें पार्षद या कभी-कभी सीधे वोट से चुना जाता है।

फिर आता है नगर आयुक्त, जो राज्य सरकार चुनती है। ये दैनिक कामकाज संभालते हैं, जैसे सड़कें ढलाना या नई परियोजनाएं शुरू करना। कमाई के रास्ते भी मजबूत हैं – घरों पर टैक्स, पानी का बिल, पार्किंग चार्ज या होर्डिंग से पैसा। कुल मिलाकर, निगम बड़े सपनों को हकीकत में बदलने का इंजन है।

नगर पालिका, मझोले शहरों की धुरी

अब बात नगर पालिकाओं की। ये मध्यम आकार के कस्बों के लिए बनी हैं, जहां लोग एक से पांच लाख के बीच बसते हैं। इलाका छोटा, जिम्मेदारियां सीमित लेकिन उतनी ही अहम। वार्ड सिस्टम यहां भी है, पार्षद चुने जाते हैं और अध्यक्ष इनका सरदार होता है। अध्यक्ष का चुनाव जनता या पार्षद ही करते हैं।

कार्यक्षेत्र में साफ-सफाई, स्ट्रीट लाइट जलाना, छोटी सड़कें बनवाना या पानी की टंकियां भरना शामिल है। निगम की तुलना में ये हल्का-फुल्का तंत्र है, लेकिन स्थानीय जरूरतों को बखूबी निभाता है। कमाई के स्रोत भी समान हैं, बस स्केल छोटा।

फर्क जो समझना जरूरी

दोनों में समानता है सेवाओं में, लेकिन अंतर आकार व ताकत में है। निगम विशालकाय होते हैं, महापौर के नेतृत्व में बड़े प्रोजेक्ट्स। पालिका संतुलित, अध्यक्ष के हाथों में साधारण विकास। निगम में आयुक्त की भूमिका मजबूत, पालिका में पार्षदों का दबदबा ज्यादा। उदाहरण लें तो मुंबई निगम है, वहीं आसपास के कस्बे पालिका।

चुनावी खेल का असर

हालिया महाराष्ट्र चुनावों ने दिखाया कि ये निकाय कितने महत्वपूर्ण हैं। जीतने वाली पार्टी विकास के वादों पर सवार हो जाती है। वोटरों को समझना चाहिए कि इनका सीधा असर उनकी जिंदगी पर पड़ता है। अगली बार वोट डालते वक्त ये फर्क याद रखें।

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info@stjohnscoeasptkmm.in

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