
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों और कानून में हुए बदलावों के बाद अब पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकारों को लेकर तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है, साल 2026 की वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार, बेटियों को बेटों के समान ही अधिकार प्राप्त हैं।
Table of Contents
पैतृक संपत्ति में ‘जन्मसिद्ध’ हक
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2005 के तहत बेटियों को ‘सह-पूंजीगत’ (Coparcener) का दर्जा दिया गया है, इसका मतलब है कि पैतृक संपत्ति (जो दादा-परदादा से चली आ रही है) में बेटी का अधिकार जन्म लेते ही सुरक्षित हो जाता है, इसे पिता या भाई अपनी मर्जी से नहीं रोक सकते।
सुप्रीम कोर्ट का विनीता शर्मा फैसला (2020) अब भी प्रभावी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि बेटी के अधिकार के लिए यह जरूरी नहीं है कि पिता कानून संशोधन की तारीख (9 सितंबर 2005) को जीवित हों अगर पिता की मृत्यु 2005 से पहले भी हो चुकी है, तब भी बेटी अपने कानूनी हिस्से की हकदार है।
शादी के बाद भी नहीं खत्म होता अधिकार
कानून के अनुसार, बेटी की शादी हो जाने से उसका पिता की संपत्ति पर अधिकार खत्म नहीं होता। वह ताउम्र अपने पिता की पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांग सकती है।
स्व-अर्जित संपत्ति (Self-acquired Property) के नियम
- अगर पिता ने अपनी कमाई से संपत्ति खरीदी है, तो वे उसे अपनी मर्जी से किसी को भी दे सकते हैं (जैसे सिर्फ बेटे को या किसी अन्य को)।
- यदि पिता ने कोई वसीयत नहीं छोड़ी है, तो उनकी निजी संपत्ति पर भी बेटी का उतना ही हक होगा जितना बेटे और माँ का।
यह भी देखें: पहाड़ों पर बर्फबारी, मैदानों में छुट्टी और ‘लॉन्ग वीकेंड’ का तड़का; जानें घूमने का बेस्ट प्लान।
बच्चों को भी मिलता है हक
यदि किसी बेटी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके बच्चे अपनी मां के हिस्से वाली नाना की संपत्ति पर कानूनी दावा कर सकते हैं, आज के कानून में बेटा और बेटी समान उत्तराधिकारी हैं, अधिक जानकारी या अधिनियम की बारीकियों के लिए आप भारत सरकार के विधायी विभाग (Legislative Department) की आधिकारिक वेबसाइट पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधान देख सकते हैं।
















