
भारत में संपत्ति के बंटवारे को लेकर हमेशा से विवाद चलते रहते हैं, खासकर जब बात बेटियों के अधिकारों की हो। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है, जो पुराने कानूनों को फिर से याद दिलाता है। अगर किसी हिंदू पिता की मौत 9 सितंबर 1956 से पहले हो गई थी, तो बेटी उनकी संपत्ति पर दावा नहीं कर सकती। ये सुनने में थोड़ा कठोर लगता है, लेकिन कानून की नजर में ये साफ है। आइए, इस फैसले की पूरी कहानी समझते हैं, ताकि आप भी अपने परिवार के मामलों में सतर्क रहें।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला
दोस्तों, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के लागू होने से पहले की मौतों पर पुराने ‘मिताक्षरा कानून’ ही लागू होते हैं। इस कानून के तहत बेटियां पैतृक संपत्ति पर हक नहीं बना सकतीं। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास ने 13 अक्टूबर को ये फैसला दिया। मैं सोचता हूं, ये फैसला कई पुराने परिवारों के विवाद सुलझा सकता है, लेकिन बेटियों के लिए थोड़ा निराशाजनक भी है। फिर भी, कानून तो कानून है।
विवाद की शुरुआत
ये मामला छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले से जुड़ा है। रगमानिया नाम की एक महिला ने 2005 में सिविल कोर्ट में केस दायर किया। उन्होंने अपने पिता सुधिन की संपत्ति में हिस्सा मांगा। लेकिन सुधिन की मौत तो 1950-51 में ही हो चुकी थी – यानी 1956 से 5-6 साल पहले। निचली अदालत ने केस खारिज कर दिया, अपील कोर्ट ने भी। हाईकोर्ट ने भी वही राय दी। मेरे ख्याल से, इतने साल बाद केस लड़ना आसान नहीं होता, लेकिन कानून ने साफ तौर पर रोक लगा दी।
अदालत की मुख्य दलीलें
कोर्ट ने कहा कि 1956 का कानून रेट्रोस्पेक्टिव (पीछे मुड़कर) लागू नहीं होता। अगर पिता की मौत पहले हुई, तो संपत्ति बेटे को ही मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट के 2020 और 2022 के फैसलों का हवाला देकर कोर्ट ने ये पुष्टि की। जस्टिस व्यास ने निचली अदालतों की तारीफ की कि उन्होंने कानून सही समझा। भाई, ये सुनकर लगता है कि कानून पुरानी परंपराओं को अभी भी महत्व देता है, लेकिन समय के साथ बदलाव आ रहा है।
पैतृक संपत्ति पर पुराने नियम
‘मिताक्षरा कानून’ के मुताबिक, हिंदू परिवार में पैतृक संपत्ति बेटे को जाती है। सुधिन की खुद की कमाई वाली संपत्ति भी बेटे बैगादास को ही ट्रांसफर हुई। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि बेटी का कोई कानूनी दावा नहीं। अगर पिता के कोई बेटे ही न हों, तो बात अलग है – तब बेटियां हकदार होंगी। ये नियम सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में स्पष्ट किए थे। परिवारों को ये समझना चाहिए कि दस्तावेज सही रखें।
अन्य कोर्ट्स के फैसले
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2024 में भी यही कहा कि 1956 से पहले की मौत पर बेटी का दावा नहीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में ये साफ किया कि बेटे न होने पर बेटियां पहली हकदार। ये फैसले बेटियों के अधिकार मजबूत कर रहे हैं, लेकिन पुराने मामलों में सीमाएं हैं। मैंने कई परिवारों में देखा है कि ऐसे विवाद रिश्ते तोड़ देते हैं, इसलिए कानूनी सलाह लें।
बेटियों के अधिकारों का भविष्य
आज के समय में बेटियां संपत्ति में बराबर हक की बात करती हैं, और कानून भी उसी दिशा में जा रहा है। लेकिन ये फैसला याद दिलाता है कि पुराने केसों में सावधानी बरतें। अगर आपके परिवार में ऐसा कोई विवाद है, तो वकील से मिलें। सरकार को भी चाहिए कि कानूनों को और स्पष्ट करे। कुल मिलाकर, ये फैसला न्याय का प्रतीक है, भले ही सबको खुश न करे।
















