आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति विवादों को निपटाने के लिए एक क्रांतिकारी फैसला दिया है। 8 जनवरी 2026 को आए इस फैसले में कोर्ट ने साफ कहा कि अगर किसी कृषि जमीन पर मालिकाना हक का मुकदमा चल रहा है, तो उस समय खरीदे गए हिस्से के नए मालिक को केस में पक्ष बनाना जरूरी नहीं। ‘लिस पेंडेंस’ सिद्धांत ही काफी है, जो खरीदार को अंतिम फैसले से बांध देता है। यह मामला अनमैया जिले की एक पारिवारिक पुश्तैनी जमीन से जुड़ा है, जहां भाई-भाई और रिश्तेदारों के बीच सालों से झगड़ा चल रहा था।

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पारिवारिक जमीन पर छिड़ा लंबा विवाद
कहानी शुरू होती है अनमैया जिले की 3.45 एकड़ कृषि भूमि से। तीन भाइयों ने दावा किया कि यह उनकी पूरी पुश्तैनी संपत्ति है। वे रिश्तेदारों को जमीन पर घुसपैठ रोकना चाहते थे, इसलिए कोर्ट में स्थायी निषेधाज्ञा की गुहार लगाई। मुकदमे चरम पर था तभी एक रिश्तेदार ने अपनी बताई 50% हिस्सेदारी का कुछ भाग बाहरी व्यक्ति को बेच दिया। बिक्री 5 नवंबर 2018 को रजिस्टर्ड दस्तावेज से हुई, और खरीदार का नाम रिकॉर्ड में आ गया। भाइयों ने कोर्ट से कहा कि इस नए खरीदार को केस में जोड़ा जाए, ताकि फैसला पूरी तरह लागू हो। लेकिन निचली अदालत ने इनकार कर दिया, और हाईकोर्ट ने इसे सही ठहराया।
कोर्ट ने क्यों खारिज की अर्जी?
हाईकोर्ट ने तर्क दिया कि मुकदमे के दौरान हुई बिक्री लिस पेंडेंस के दायरे में आती है। खरीदार को पक्षकार बनाए बिना भी कोर्ट का अंतिम आदेश उसके हक को प्रभावित करेगा। इससे मूल वादी (भाइयों) को कोई नुकसान नहीं, और केस अनावश्यक लंबा नहीं खिंचेगा। जस्टिस ने स्पष्ट किया कि खरीदार का दावा पहले से ही फैसले पर टिका है। अगर भाई जीतते हैं, तो खरीदार की सेल डीड बेकार हो जाएगी। यह फैसला संपत्ति मामलों में तेजी लाएगा।
लिस पेंडेंस, कानून का मजबूत ढाल
लिस पेंडेंस लैटिन शब्द है, मतलब ‘विवाद लंबित’। यह संपत्ति हस्तांतरण कानून की धारा 52 का आधार है। सरल शब्दों में:
- मुकदमे वाली प्रॉपर्टी खरीदो, तो फैसले का रिस्क अपने साथ लो।
- बिक्री वैध रहती है, लेकिन कोर्ट के नतीजे से बंधी।
- खरीदार कह नहीं सकता, “मैं पार्टी नहीं था, इसलिए मेरा हक सुरक्षित।”
यह सिद्धांत परिवारिक झगड़ों में बिक्री रोकता है, अदालतों को जटिलताओं से बचाता है।
क्यों है यह सिद्धांत जरूरी?
कल्पना कीजिए, कोई मुकदमे के बीच जमीन बेच दे, तो केस थम जाए। लिस पेंडेंस इसे रोकता है। नई पार्टी जोड़ने से मुकदमे दोबारा शुरू हो सकते हैं। यह खरीदारों को सावधान करता है: हमेशा चेक करें कि जमीन पर कोई कोर्ट केस तो नहीं। वरना, पैसे डूब सकते हैं। आंध्र प्रदेश का यह फैसला पूरे देश के लिए मिसाल बनेगा, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां पुश्तैनी जमीनों पर विवाद आम हैं।
















