भारत में पैतृक संपत्ति के बंटवारे को लेकर परिवारों में अक्सर विवाद होते हैं। खासकर शादीशुदा बेटियों के अधिकारों पर सवाल उठते रहते हैं। कानून ने समय के साथ बदलाव किए हैं, लेकिन कुछ पुराने नियम अभी भी लागू हैं। अगर आपकी बेटी या बहन का केस है, तो ये जानकारियां बहुत काम आएंगी। हम सरल भाषा में समझाएंगे कि कब हक मिलेगा और कब नहीं। ध्यान रखें, हर फैमिली की स्थिति अलग होती है, इसलिए वकील से सलाह जरूरी है।

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बेटियों को बेटों जैसा बराबर हिस्सा
1956 के बाद का कानून बेटियों के लिए गेम चेंजर साबित हुआ। इस नियम के तहत पिता की स्वयं कमाई गई संपत्ति में बेटी को बेटों के बराबर अधिकार मिलता है। चाहे भाई कितने भी हों, हिस्सा बराबर बंटेगा।
उदाहरण लीजिए। मान लीजिए पिता ने 1980 में एक प्लॉट खरीदा और 2010 में उनकी मृत्यु हो गई। यहां बेटी को पूरा हक मिलेगा, क्योंकि मौत 1956 के बाद हुई। शादीशुदा होना कोई बाधा नहीं। यह नियम हिंदू परिवारों पर लागू होता है और लाखों महिलाओं को मजबूत बनाता है। लेकिन पैतृक संपत्ति मतलब वही नहीं जो दादा या परदादा से चली आई हो। पिता की नई प्रॉपर्टी पर फोकस रहता है।
पुराने नियम, कब बेटी का हक खत्म हो जाता है
अब बात करते हैं उन केस की जहां बेटी को कुछ नहीं मिलता। अगर पिता की मौत 1956 से पहले हो चुकी, तो पुराना मिताक्षरा सिस्टम लागू होता है। इसमें पैतृक संपत्ति सिर्फ बेटों की होती थी। बेटी को हिस्सा तभी मिलता जब परिवार में कोई बेटा न हो।
कल्पना कीजिए एक परिवार जहां दादा की जमीन 1940 में बेटे को मिली और वह 1950 में चल बसे। उनकी शादीशुदा बेटी अब दावा करेगी, लेकिन कानून कहेगा नहीं। केवल बेटे उत्तराधिकारी माने जाते। यह नियम आज भी कई पुराने केस में काम करता है। शादीशुदा बेटियां अक्सर सोचती हैं कि नया कानून सबकुछ बदल देगा, लेकिन तारीख तय करती है।
फैमिली डिस्प्यूट से बचने के आसान टिप्स
इन नियमों को समझने के बाद क्या करें। सबसे पहले सभी पुराने कागजात इकट्ठा करें। मौत का सर्टिफिकेट, प्रॉपर्टी डीड और फैमिली ट्री चेक करें। अगर विवाद हो, तो लोकल कोर्ट में अपील करें। कई बार मीडिएशन से मामला सुलझ जाता है।
माता-पिता को सलाह है कि वसीयत जरूर लिखें। 2005 के संशोधन ने बेटियों को और मजबूत किया, लेकिन पुराने केस प्रभावित रहते हैं। बहनों को जागरूक रहना चाहिए। अगर भाई हिस्सा न दें, तो कानूनी नोटिस भेजें। समय रहते एक्शन लें, वरना लिमिटेशन पीरियड खत्म हो जाएगा।
आगे क्या बदलेगा कानून में
कानून समय के साथ विकसित हो रहा है। महिलाओं के अधिकार मजबूत हो रहे हैं, लेकिन जागरूकता की कमी से नुकसान होता है। ग्रामीण इलाकों में अभी भी पुरानी सोच हावी है। सरकार जागरूकता कैंपेन चला रही है। आप भी फैमिली में चर्चा शुरू करें।
अंत में, संपत्ति का बंटवारा प्यार बढ़ाए, न कि तोड़े। ये नियम जानकर आप फैमिली को एकजुट रख सकते हैं। अगर डाउट हो, तो एक्सपर्ट से मिलें। सही जानकारी ही सबसे बड़ा हथियार है।
















